SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.

आत्म- निर्भरता

Posted by Priyanka Telang On 3:50 AM 4 comments


मैं स्वयं पर निर्भर करता हूँ
अंगारों के पथ पर चलता हूँ

इस माया के संसार में मुझको
क्या खोना क्या पाना है ?
मैं खुश हूँ अपने आप मैं ही
ना ओरों की होड़ में करता हूँ..................

निकला हूँ एक तलाश पे मैं
जो डूब गया उसे पाने की
इस जीवन के तम् मार्ग पे मैं
सूरज को खोजा करता हूँ................

मैंने अपनी इन आँखों से
लोगों को बदलते देखा है
वो कहते हैं मुझको बागी
जब अपनी मर्ज़ी से चलता हूँ.................

तुम चाहो मुझको अपना लो
तुम चाहो मुझको ठुकरा दो
टिकता ही नहीं एक रात कहीं
पल पल मैं दिशा बदलता हूँ................

कुछ कहते हैं मुझको पागल
कुछ कहते हैं दीवाना हूँ में
इस कारण जलते हैं मुझसे
की जो चाहता हूँ कर गुज़रता हूँ...............

Reactions: 

4 Response for the "आत्म- निर्भरता"

  1. nice blog

  2. उत्साह को दिखाती व उत्साह को भरने वाली रचना. शुक्र्यिया. जारी रहें.
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    उल्टा तीर पर पूरे अगस्त भर आज़ादी का जश्न "एक चिट्ठी देश के नाम लिखकर" मनाइए- बस इस अगस्त तक. आपकी चिट्ठी २९ अगस्त ०९ तक हमें आपकी तस्वीर व संक्षिप्त परिचय के साथ भेज दीजिये. [उल्टा तीर] please visit: ultateer.blogspot.com/

  3. जीवन के आरोहण पर बहुत सुंदर गीत रचना है, ऐसे ही किन्हीं शब्दों से में खोया रहा करता था कभी " हम दीवानों की क्या हस्ती है आज यहाँ कल वहां चले, मस्ती कालम साथ चला हम धूल उडाते जहाँ चले..." तस्वीरें भी बहुत नेचुरल और अपीलिंग हैं. लिखतेरहिये.

  4. कुछ कहते हैं मुझको पागल
    कुछ कहते हैं दीवाना हूँ में
    इस कारण जलते हैं मुझसे
    की जो चाहता हूँ कर गुज़रता हूँ...

    अच्छी काव्य रचना के लिए आभार
    शुभमगलभावो सहीत

    खमत खामणा का महत्व

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