SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.


ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया
जो  खो  गया  था  कहीं  मुझसे .. नहीं  मिल  पाया
मैं  अकेला  हो  गया  हूँ ... फिर  से  उन्ही  राहों  पे
जहाँ  शुरआत  हुई  थी ... अंत  भी  वहीँ  आया

जो ख्वाब सजाये थे कभी...  बिखरे  पड़े  हैं
मेरे  ही  कन्धों  पे सभी  इलज़ाम  लदे हैं
मेरी  उड़ान  पूरी नहीं हुई.... अब तक...
कि  मेरे  पाँव फिर  धरातल  पे .. आ  लगे  हैं

ठोकरें  बहुत खायी  हैं .. वैसे  तो अक्सर ...
पर इस  दफा गिरा हूँ ऐसा . कि  उठ  नहीं  पाया ..
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वज़ूद  पे  यकीन  आया ....

कैसे मैं सम्हालूं  .. इन  फिसलते  लम्हों  को ?
कैसे  सुधारूं ... मैं  अपनी  गलतियों  को ..?

मेरी  ज़िन्दगी  कि ... कहानी  अजब  है !
मेरी  गुस्ताखियों  का .. बस  इतना  सबब  है ..
कि  दुश्मन  नहीं  था..  कभी  कोई  मेरा ...
मैंने  अपने  ही  हाथों  अपना ... आशियाना ..जलाया ....
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....


जिसकी  आरज़ू में करवटें बदलता था रातों ...
छलनी  हुआ  है  वो ... मेरे  ही  हाथों ...
सुनाऊं मैं  कैसे?  ये  किस्सा  नहीं  था
जो  घायल  हुआ..  वो  था  मेरा  मसीहा ...

अपनी  लाश  पे  में ..बहुत  रो  चुका  हूँ
बताऊँ  मैं किसको ..कि  क्या  खो  चुका  हूँ ...
जिसको  लहू  से  था  सींचा .. वो  घर  मैंने  ढहाया
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....

दुआओं  का  होता  नहीं .. मुझ  पर  असर  कोई 
वरना  महज़  हाथ  उठा  के  ओरों  ने  क्या  नहीं  पाया
कुछ  तो  कहीं कम था... मेरी  ही  बंदगी  में
जिसे  भी  खुदा  माना ..वो  फिर  नज़र  नहीं  आया !!
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ...

Reactions: 

2 Response for the "ज़िन्दगी फिर तेरे वज़ूद पे यकीन आया ..."

  1. Suvrat says:

    Something is bounding
    something retrieving
    A lot you are losing
    But sensing them is what we call achieving

    In the times of despair when those words don't console
    Let the silence encroach coz it does play its role
    You can analyze and go deeper in your soul
    Apparently you may not know where you are but soon you'll realize this's been your goal!!!

  2. You are good writer n thinker too. haa...nice...keep it up

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