SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.
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वो पूछते हैं , अरे मुसाफिर चला कहाँ को?
क्या तेरी मंज़िल का पता तुझे है?....
कह दिया उनको,.... मैंने मुस्कुरा के.…
जहाँ पे मिलेगा …  ये सूरज ज़मीं से
है बस मुझे भी ,… जाना वहीँ पे …

हर दिन मैं मंज़िल , … नयी ढूंढता हूँ

अब मेरा मज़हब आवारगी है।

कभी मैं गुज़रता हूँ जंगलों से। …

कभी मैं निकलता हूँ पर्वतों से.…
नदी , झरने , राहें … हैं मेरे साथी
हर मुश्किल मुझे , नया  सबक सिखाती। …
सभी बंदिशों से ,  मैं बेखबर हूँ
आवारा परिंदों का ,  मैं हमसफ़र हूँ। .......

नहीं मेरा नाता मस्जिद , मंदिरो से.…
बस मेरा मज़हब आवारगी है !

सफर मैं मज़ा.. जब से आने लगा है

मेरा डर कहीं तो , ठिकाने लगा है.……
समेटा है जब से.. अपने हौसलों को
हर दर्द मुझसे खौफ खाने लगा है। ....
मजबूरियों  से जब...बढ़ा ली है दूरी। ....
अब जो भी कमी है...मैं कर लूँगा पूरी।

मेरी   आज़ादी  ही...  मेरी बंदगी है
हाँ मेरा मज़हब आवारगी है.…






ज़िन्दगी तुझसे कई उम्मीदें लगा बैठे हैं।
क्या कहें ख्वाहिशें क्या दिल में सजा बैठे हैं।


 ग़म से तोड़ दिए हमने.............. पुराने रिश्ते

बेपरवाह होके........... नए रिश्ते बना बैठे हैं।


शोर न समझो... मेरी सांसों के बदलते सरगम को

ये साज़ हम.............. बरसों से दबा बैठे हैं।


क्या मिला है किसी को.… साहिल पे खड़े होकर

हम तो लहरों पे....... नयी राहें बना बैठे हैं।


ये वक़्त भी देखना बाकी था..... ऐ हमदम

की अफसाना-ऐ-हस्ती का मेरी.... लोग किस्सा बना बैठे हैं।


लुत्फ़-ऐ-हयात तो... गर्दिश मैं ही समझ आता है

गुज़र जायेंगे हर मुश्किल से... ये शर्त लगा बैठे हैं।


ज़रा बहती हुई हवा का रुख पहचानो।

इसमें कुछ लोग... हर चीज़ गँवा बैठे हैं।


ज़िन्दगी चुरा ले गयी......  वक़्त मेरे हाथों से

अब आखिरी दाव ज़िन्दगी का.... लगा बैठे हैं।








ज़िन्दगी  आखिर.... तेरी वजह क्या है ?
मेरी आरज़ू अगर तू है... तो  फिर तलब क्या है?
हर एक मोड़ पे... मकाम नया दीखता है !
हर मकाम पे लेकिन ... ये नया मोड़ क्या है ?

ना बीती है ना .. बची है जो

ये दास्तान अधूरी है जो ....
मेरी मंजूरी  तो नहीं है
पर ये मजबूरी क्या है ?

ज़िन्दगी हाथों से रेत की तरह ... क्यूँ फिसलती है?  

हर आहट पे ये तन्हाई ... क्यूँ और भी मचलती है ?
गर  सांसों से ही बंधा है ... जीने का सबब ...
तो इस दिल के ... धड़कने का ... भला मतलब क्या है?

मेरे तरसते ख्वाबों को भी समझाए कोई

क्या  मज़ा ...सजा हँस के काटने मैं है .. बताये कोई ?
मेरी आँखों को ..पहले से ही खबर थी .. मेरे सपनों की
खलल जो नींद मैं .. आया तो ...गलत क्या है?

जो उम्मीद पे ही कायम है ये जहां ...

तो मेरे कन्धों का बोझ भी ... तो उतारे कोई ..
तम्मानाये जब होती  हैं  टूटने के ही लिए
तो बेवजह झूठे दिलासे की ज़रुरत  क्या  है।

ज़िन्दगी आखिर तेरी वजह क्या है ?.

मेरी आरज़ू अगर तू है... तो  फिर तलब क्या है?


ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया
जो  खो  गया  था  कहीं  मुझसे .. नहीं  मिल  पाया
मैं  अकेला  हो  गया  हूँ ... फिर  से  उन्ही  राहों  पे
जहाँ  शुरआत  हुई  थी ... अंत  भी  वहीँ  आया

जो ख्वाब सजाये थे कभी...  बिखरे  पड़े  हैं
मेरे  ही  कन्धों  पे सभी  इलज़ाम  लदे हैं
मेरी  उड़ान  पूरी नहीं हुई.... अब तक...
कि  मेरे  पाँव फिर  धरातल  पे .. आ  लगे  हैं

ठोकरें  बहुत खायी  हैं .. वैसे  तो अक्सर ...
पर इस  दफा गिरा हूँ ऐसा . कि  उठ  नहीं  पाया ..
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वज़ूद  पे  यकीन  आया ....

कैसे मैं सम्हालूं  .. इन  फिसलते  लम्हों  को ?
कैसे  सुधारूं ... मैं  अपनी  गलतियों  को ..?

मेरी  ज़िन्दगी  कि ... कहानी  अजब  है !
मेरी  गुस्ताखियों  का .. बस  इतना  सबब  है ..
कि  दुश्मन  नहीं  था..  कभी  कोई  मेरा ...
मैंने  अपने  ही  हाथों  अपना ... आशियाना ..जलाया ....
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....


जिसकी  आरज़ू में करवटें बदलता था रातों ...
छलनी  हुआ  है  वो ... मेरे  ही  हाथों ...
सुनाऊं मैं  कैसे?  ये  किस्सा  नहीं  था
जो  घायल  हुआ..  वो  था  मेरा  मसीहा ...

अपनी  लाश  पे  में ..बहुत  रो  चुका  हूँ
बताऊँ  मैं किसको ..कि  क्या  खो  चुका  हूँ ...
जिसको  लहू  से  था  सींचा .. वो  घर  मैंने  ढहाया
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....

दुआओं  का  होता  नहीं .. मुझ  पर  असर  कोई 
वरना  महज़  हाथ  उठा  के  ओरों  ने  क्या  नहीं  पाया
कुछ  तो  कहीं कम था... मेरी  ही  बंदगी  में
जिसे  भी  खुदा  माना ..वो  फिर  नज़र  नहीं  आया !!
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ...

मैं स्वतंत्र हूँ !!

Posted by Priyanka Telang On 9:24 AM 1 comments



सदियों से सदा......... मेरा शोषण हुआ
मन साफ़ था फिर भी.... आँचल मेरा मैला हुआ
मैंने तुम्हारे सम्मान  की  खातिर... क्या.. ना किया ?
तुम्हे पूजा... और स्वयं... विष अपमान का पीया 
  
ये विषपान करके भी... मैं अनंत हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

वो पदमिनी हूँ जिसने... निर्भीक हो जौहर  किया
वो जानकी हूँ जिसने... सदा स्वयं को अर्पण किया
में शक्ति हूँ परंतु फिर भी..... मैंने सब सहा
हर मोड़ पे अगनि परीक्षा दी... पर कुछ भी ना कहा 

ऐसी अखंड लौ हूँ जो.. आँधियों में भी ज्वलंत  हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैंने आप खोकर.... तुमको नया आकार दिया 
खुद बलिदान हो.... तुम्हारे सपनों को साकार किया 
तुम्हारी जीत के पीछे... हमेशा मैं खड़ी थी
हर विषम परिस्तिथी से .. अकेली ही लड़ी थी 

तुम नहीं समझे... तुम्हारी  विजय  का  मन्त्र हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैं जननी भी... मैं पत्नी भी ...सहेली भी ... मैं भगिनी भी  
मैं पृथ्वी भी... मैं अगनि  भी...जो तुम चाहो.... मैं सब कुछ हूँ 
ना रोको!.. जो मैं बढती हूँ .. तुम्हारे साथ चलती हूँ !
अहम् त्यागो और पहचानो.... मैं तुम्हारा संबल हूँ !

क्रांति की लहर है जो...  नारीत्व का वो नवीन अर्थ हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !


खुली  हवा  सा  बहता  था...  कैसे  मैं  बंध  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?

यूँ  ही  निकलता ...कभी  रुकता  कभी  चलता 
हर  रोज़ मैं किसी ... नए  मौसम  से  मिलता
कोई डोर  नहीं  थी ... बाँध  लेती  जो  मुझे 
कोई  छोर नहीं  था ... ना  ढूंढूं  में  जिसे !

 ये कैसा अँधेरा  है .. जिसे  देख  थम  गया  हूँ ...
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?

सूरज  की नर्म  किरणें ... हौले  से  थपकती  थीं 
गुज़रती हुई  हवाएं ... मेरे  गले  लगतीं  थीं 
ओस  की  बूंदों  में ... मेरा अक्स दीखता था   
हर राहबर मुझे... अपना कोई लगता था !

ये  वक्त  की  है  करवट ... या  मैं  बदल  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?


हर  शाम  ढूंढता  था .... कोई  नया  बसेरा ...
कई हौसले देता था..... मुझको नया सवेरा 
हर  राह  लगती  है ... अब  अजनबी  सी  मुझको 
जिनसे  कभी  था  मेरा ...सम्बन्ध बहुत  गहरा ..


ठोकर  लगी  है  मुझको ?.. या  में  फिसल  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?



ग़म  का  अक्सर .. आना-जाना हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


बे 'बाक  होके  में  चला .. मंजिल  को  पाने
बेख़ौफ़  हो .... निकला  था  खुद  को  आजमाने ..
कुछ  हादसा  ऐसा  हुआ ...सब  ख़ाक  हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


क्या  ज़मीं .... क्या आसमां ...
क्या फलक ...क्या  हावियाह..........
हर  जगह ... मेरा .. ठिकाना  हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


अब  नहीं  कुछ  भी ..... की  जिसका  ग़म  करूँ
मुस्तकिल  नहीं  है कुछ ... तो  फिर  में  क्यूँ  डरूं
मेरा  नहीं  था  वो ... जो  मुझसे  खो  गया ..
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


सच्चा  नहीं  कोई ... तो  किसकी  में  सुनूँ ?
में  वो  बशर  हूँ .. जो अपनी  मर्ज़ी  से  चलूँ 
नयी  राह  पे  निकला....तो  रुसवा  हो  गया 
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ..




हावियाह  :  The Lowest Region Of Hell
फलक     :  Heaven
मुस्तकिल  :  Never ending, Permanent
बशर    :  man, person




राह  मैं  यूँ  बढ़ता  जा  रहा  हूँ
मैं  असलियत  को  झुठला  रहा  हूँ ...........

कठिनाइयाँ  होती  हैं  उन्नति  के  पथ  पर
मैं  आसानियाँ  क्यों  चाह  रहा  हूँ ................

संघर्षों  से  ही  मिलता  है किनारा
तूफानों  से  फिर  क्यों  मैं  घबरा  रहा  हूँ .................

मुनासिब  नहीं  हर  कोई  हो  मसीहा
उम्मीदें  सभी  से  क्यों  लगा  रहा  हूँ .................

यह  जीवन  है  आग  का  एक  दरिया
में  इस  से  बच  के  किधर  जा  रहा  हूँ ......................

पिछड़ा  हूँ  अपने  ही  साथियों  से
अब  अजनबियों  से  यारी  बढ़ा  रहा  हूँ ................

इस भीड़ मैं  हो  गया  हूँ  तनहा
खुद  से  ही  बातें  किये  जा  रहा  हूँ ................................

जब  से  दुनिया  आई  है  समझ  मैं
दुनिया  से  में  दूरी  बढ़ा  रहा  हूँ .................



तूफ़ान  से  नहीं  घबराते  हैं
मुश्किल  मैं  निखर  जाते  हैं
हम  तो  वो  आंधी  हैं  जो
पर्वत  से  गति  पाते  हैं

ना  जलते  हैं  अंगारों  से
ना  रुकते  हैं  दीवारों  से
जब  आ  जाएँ  अपनी  पर  तो
गर्दिश  मैं  जीत के आते हैं

साथी  की नहीं  हमें  अभिलाषा
ना  रखते  दुनिया  से  आशा
जब  चलते  हैं  मंजिल  के  लिए
तो साए  ही साथ  निभाते  हैं

लिख  दें  खुद किस्मत  की  रेखा
कल  का  सूरज  किसने  देखा
हम  ऐसे  आतिश  हैं  जो
अंधेरों  से  रौशनी  पाते  हैं

आत्म- निर्भरता

Posted by Priyanka Telang On 3:50 AM 4 comments


मैं स्वयं पर निर्भर करता हूँ
अंगारों के पथ पर चलता हूँ

इस माया के संसार में मुझको
क्या खोना क्या पाना है ?
मैं खुश हूँ अपने आप मैं ही
ना ओरों की होड़ में करता हूँ..................

निकला हूँ एक तलाश पे मैं
जो डूब गया उसे पाने की
इस जीवन के तम् मार्ग पे मैं
सूरज को खोजा करता हूँ................

मैंने अपनी इन आँखों से
लोगों को बदलते देखा है
वो कहते हैं मुझको बागी
जब अपनी मर्ज़ी से चलता हूँ.................

तुम चाहो मुझको अपना लो
तुम चाहो मुझको ठुकरा दो
टिकता ही नहीं एक रात कहीं
पल पल मैं दिशा बदलता हूँ................

कुछ कहते हैं मुझको पागल
कुछ कहते हैं दीवाना हूँ में
इस कारण जलते हैं मुझसे
की जो चाहता हूँ कर गुज़रता हूँ...............