SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.
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मैं स्वतंत्र हूँ !!

Posted by Priyanka Telang On 9:24 AM 1 comments



सदियों से सदा......... मेरा शोषण हुआ
मन साफ़ था फिर भी.... आँचल मेरा मैला हुआ
मैंने तुम्हारे सम्मान  की  खातिर... क्या.. ना किया ?
तुम्हे पूजा... और स्वयं... विष अपमान का पीया 
  
ये विषपान करके भी... मैं अनंत हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

वो पदमिनी हूँ जिसने... निर्भीक हो जौहर  किया
वो जानकी हूँ जिसने... सदा स्वयं को अर्पण किया
में शक्ति हूँ परंतु फिर भी..... मैंने सब सहा
हर मोड़ पे अगनि परीक्षा दी... पर कुछ भी ना कहा 

ऐसी अखंड लौ हूँ जो.. आँधियों में भी ज्वलंत  हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैंने आप खोकर.... तुमको नया आकार दिया 
खुद बलिदान हो.... तुम्हारे सपनों को साकार किया 
तुम्हारी जीत के पीछे... हमेशा मैं खड़ी थी
हर विषम परिस्तिथी से .. अकेली ही लड़ी थी 

तुम नहीं समझे... तुम्हारी  विजय  का  मन्त्र हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैं जननी भी... मैं पत्नी भी ...सहेली भी ... मैं भगिनी भी  
मैं पृथ्वी भी... मैं अगनि  भी...जो तुम चाहो.... मैं सब कुछ हूँ 
ना रोको!.. जो मैं बढती हूँ .. तुम्हारे साथ चलती हूँ !
अहम् त्यागो और पहचानो.... मैं तुम्हारा संबल हूँ !

क्रांति की लहर है जो...  नारीत्व का वो नवीन अर्थ हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !



मेरी  मंजिल  के  सफ़र  तक  सिर्फ  मेरी  तनहाई  थी 
मेरी  हमसफ़र  कोई  और  नहीं .. मेरी  परछाई  थी .... 

चल  पडा  था  ढूढने .....  अपना  ठिकाना 
ना  साथी , ना  राहबर , न...  कोई  बेगाना 
धुंधली सी  एक  रूह...  मेरे  पीछे  पीछे  आई  थी 
जो  देखा  तो  जाना...  वो  मेरी...  परछाई  थी ....

मैंने  फ़िक्र  नहीं  की .. चाहे  ग़म  हो  या  ख़ुशी ..
मुझे  हर  आशना  मिला .... जैसे  कोई  अजनबी ..
पर खलवत  मैं  भी  जैसे  किसी  ने  आवाज़  लगायी  थी 
में  पलटा  तो  देखा ... वो  मेरी  परछाई  थी ....

फिर  वो  मुकाम  आया , सब  खोया  जो  था  पाया 
मैं   रोया  चिल्लाया , पर  कोई  भी  ना  आया ...
जब  घोर  अंधेरा  था ... और  वीरानी  सी  छाई  थी 
वहीँ  पे  खड़ी  थी .. वो  मेरी  परछाई  थी ...


कभी  गिरा  कभी  दौड़ा , कभी  ठहर  गया  थोड़ा
बड़ी  अज़ीयत  मैं  भी ... मैंने  हौसला  न  छोड़ा ...
अपने आप  ही  मैंने  नदामत  की  दिवार  गिराई  थी 
जो  साथ  थी  मेरे  हरदम .. वो मेरी  परछाई  थी 

अब दिन संवर गए हैं... मौसम बदल गए हैं
सारवत के हमारी अब .. आलम नए नए हैं 
मेरी बरक़त को देख... वो  होले से मुस्कुराई थी
कोई ओर नहीं............ वो मेरी परछाई थी 

आशना - acquaintance 
खलवत - Solitude, Isolation
अज़ीयत- Trouble, Difficulty
नदामत - Guilt, Regret, Repentance
सारवत - wealth, prosperity



कई  सओबत  के  बाद  अपने  से  मुलाक़ात  हुई है 
बड़ी  मुददतों   के  बाद  खुद  से बात  हुई है ...


अजब  तंग  मुफक्किर  था  में  समझ  आया
ज़िन्दगी  दायरों  में  बंधी  थी  अब  आज़ाद  हुई है  ...


रूबरू  हो  गया  में  सच  से ,खोया  हुआ  था  कब  से ..
नैमत  से  खुदा  कि  पूरी  मेरी  फरियाद  हुई है  ... 

गम -ए - दौरां  से  गुज़र  के  हो  गया  वासिक़
ठोकरें  खा  के  शक्सियत  और  भी फौलाद  हुई  है .......


ज़माने  ने  किये  तंज़ , नहीं  मुझको  कोई  रंज
ज़ुल्म  सह  के  तबियत  शौक़ -ए -हयात  हुई है . ...

मेरी  रुसवाई  बनी  मेरी  बरकत  का  सबब
मेरी  इब्तिला  मेरे  इकबाल  कि  बुनियाद  हुई है ......


मिट  जाते  हैं  सिकंदर  भी  तकदीर  बदलते  ही
खुश-बख्त  हूँ  कि  मेरी  कोशिश  तो कामयाब  हुई है .....

(सओबत - Difficulties of life)
( मुफक्किर - Thinker)
(इब्तिला - Misfortune, सुफ्फेरिंग)
(इकबाल - Prosperity, Good Fortune)
(वासिक - Strong,confident)
(शौक़ -ए -हयात  - fond of life)
(खुश -बख्त - Lucky)


नयी  उमंगों  को  पंख  मिलने  लगेंगे
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे........


हर  शाम  के  बाद  होगा  फिर  सवेरा
छटने  लगेगा  मेरे  मन  का  ये  अंधेरा.......
माज़ी  के  सारे  ज़ख्म  फिर  भरने  लगेंगे
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे ............


हर  तसुव्वर  में  तेरी ही जुस्तजू  है
हर  आब-ए-चश्म  को  तेरी  आरज़ू  है..........
तुम  कहो तो  मौसम  भी बदलने  लगेंगे
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे ...........


आवाज़  दे के  तुमने  हमको  जो  पुकारा
मिल गयी  मंजिल ,  मिल  गया  किनारा........
सब  मुश्किलों  से  हम  लड़ने  लगेंगे 
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे ...........


तुम  दिखो  तो  रात  भी  हो  जाए  रोशन
तुम  नज़र  आओ  तो  खिल  उठेंगे  गुलशन .......
तुम  चलो  तो  राह-ए-दहर  दिखने  लगेंगे
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे ............


हो  गया  कुर्बान  तेरी  बन्दगी  में
तू  अगर  आ  जाए  मेरी  ज़िन्दगी  में  .............
यह  जान -ए -जार  के  दिन  कटने  लगेंगे
तुम  रहो  तो  हौसले  बढ़ने  लगेंगे ............

Glossary :
माज़ी - Past
आब-ए-चश्म - Tears
राह-ए-दहर - Path of Life
 जान -ए -जार - difficulties of life


मुश्किलों  से  खेलना  आसान  हो  गया
तू  मिल  गया  मुझको  तो  मेरा  नाम  हो  गया


दुनिया  ने  किये  थे  मुझ  पे  सितम  कई
रक़ीब  भी  काफी  थे , दुश्मन  भी  थे  कई
महबूब  तेरा  आँचल.....  आया  जो  हाथ  में.....
सारा  ज़माना  जैसे .. मेरा गुलाम हो  गया
तू  मिल  गया  मुझको  तो  मेरा  नाम  हो  गया .....


तू  सच  है  या  है  मेरा  हसीन  ख्वाब  कोई
बिस्मिल  है  मेरा  या  फिर  दिल  का  भरम  है  कोई
आलम  है  बेखुदी  का,.. मौसम  है  दिल्लगी  का........
चाहत  में  तेरी  चर्चा  तमाम  हो  गया
तू  मिल  गया  मुझको  तो  मेरा  नाम  हो  गया .....


रंग  जैसे  संगेमरमर  ये  तीर  नज़र  उस  पर
तेरी  ये  अदा  दिलबर, करती  है असर  दिल  पर
हालत  संवर  गयी  है .. तबियत  मचल  गयी  है......
तेरी  एक  निगाह  में  सारा  कमाल  हो  गया
तू  मिल  गया  मुझको  तो  मेरा  नाम  हो  गया .....


उल्फत  में  तेरी  खोया  तो  फिर  कभी  ना  रोया
किस्मत  बदल  गयी  है  जब  से  जुल्फों  में  तेरी  सोया
ऐ  हमदम  अब  तेरे  बिन .... कटते  नहीं  हैं  ये  दिन
तेरी  आरज़ू  में सब  कुछ  कुर्बान  हो  गया
तू  मिल  गया  मुझको  तो  मेरा  नाम  हो  गया .....


मेरी  बस  एक  तमन्ना  है
जो  चाहूं  वो  खुद  कर  पाऊँ ........
चाहे  पथ  हो  कुछ  उलझनों  भरा
पर  अंततः  मंजिल  को  पाऊं  .............

अपने  अधिकारों  से  पहले
मैं  कर्तव्यों  का  मान  करूं ,..............
ना  बिसराऊँ  मार्ग  भलाई  का
निर्बल  का  सहारा  बन  पाऊँ ..................

   चाहे  आये  मुश्किलें  हज़ार
   करना  मुझको  ना  पड़े  विचार .........
   जो  कश्ती  घिरी  हो  तूफ़ान  से
   मैं  उसका  किनारा  बन  पाऊँ .........

   आदर्श  नहीं  प्रस्तुत  करना
   मुझको  है  बस  इतना  करना ............
   जो  मार्ग  महापुरुषों  ने  चुना
   उस  मार्ग  पर  मैं  भी  चल  पाऊँ .................


ज़ख्म जो  मोहब्बत  ने  दिए  थे...  दोस्ती  ने  भरे  हैं
हालात..  ये   मेरे.. , मेरी  समझ  के  परे  हैं ......

शिकायत  करूँ  तो  किस  से?.  वो  क्या  समझेंगे  हाले  दिल ...
की  मेरे  जान  के  पीछे ..... मेरे  अपने  ही  पड़े  हैं .......

हिम्मत  नहीं...  कि.. फिर  किसी  से  दिल्लगी  करें ..
बड़ी  मुश्किलों  से...  दिल  के  ये  घाव भरे  हैं .....

तू  कौन  है ?.., कब  था?..  मैंने  सब  भुला  दिया
अब  नयी  मंजिलों  की  और  मेरे  पाँव  बढे  हैं .......

अफ्सुर्दगी  मैं  सराबोर, हूँ,..  मगर फिर भी
उम्मीद  भी  कायम है  और  हौसले  भी  बड़े  हैं ....



तूफ़ान  से  नहीं  घबराते  हैं
मुश्किल  मैं  निखर  जाते  हैं
हम  तो  वो  आंधी  हैं  जो
पर्वत  से  गति  पाते  हैं

ना  जलते  हैं  अंगारों  से
ना  रुकते  हैं  दीवारों  से
जब  आ  जाएँ  अपनी  पर  तो
गर्दिश  मैं  जीत के आते हैं

साथी  की नहीं  हमें  अभिलाषा
ना  रखते  दुनिया  से  आशा
जब  चलते  हैं  मंजिल  के  लिए
तो साए  ही साथ  निभाते  हैं

लिख  दें  खुद किस्मत  की  रेखा
कल  का  सूरज  किसने  देखा
हम  ऐसे  आतिश  हैं  जो
अंधेरों  से  रौशनी  पाते  हैं



ज़िन्दगी में खुशियों की घटा फिर से छायीं हैं
सैलाब कैसा ये हवाएं  ले के आयीं हैं
मैं तो बिखर चुका था भंवर मैं अतीत के 
ये बहारें कहाँ से मुझे समेट लायी हैं 


ख़ाक मैं मिल जाने को हम तैयार थे लेकिन
चिता को बारिश की बूँदें बुझा आयीं हैं
इस डर से कि  ना खो जाऊं फिर कहीं दुनिया कि भीड़ में
अपनों कि दुआएं मेरी पहचान लायीं हैं





आत्म- निर्भरता

Posted by Priyanka Telang On 3:50 AM 4 comments


मैं स्वयं पर निर्भर करता हूँ
अंगारों के पथ पर चलता हूँ

इस माया के संसार में मुझको
क्या खोना क्या पाना है ?
मैं खुश हूँ अपने आप मैं ही
ना ओरों की होड़ में करता हूँ..................

निकला हूँ एक तलाश पे मैं
जो डूब गया उसे पाने की
इस जीवन के तम् मार्ग पे मैं
सूरज को खोजा करता हूँ................

मैंने अपनी इन आँखों से
लोगों को बदलते देखा है
वो कहते हैं मुझको बागी
जब अपनी मर्ज़ी से चलता हूँ.................

तुम चाहो मुझको अपना लो
तुम चाहो मुझको ठुकरा दो
टिकता ही नहीं एक रात कहीं
पल पल मैं दिशा बदलता हूँ................

कुछ कहते हैं मुझको पागल
कुछ कहते हैं दीवाना हूँ में
इस कारण जलते हैं मुझसे
की जो चाहता हूँ कर गुज़रता हूँ...............