SWATANTRA...SOCH

All religions, arts and sciences are branches of the same tree. All these aspirations are directed toward ennobling man's life, lifting it from the sphere of mere physical existence and leading the individual towards freedom.No one should negotiate their dreams. Dreams must be free to flee and fly high.

  • About This Blog

    This blog contains poems written by me on different topics and with different essence everytime, along with photographs shot by me during various trips in India and UK containing macros, sceneries, urban and rural shots, I hope this blog will serve you with a range of variety and you will enjoy my work.
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बड़े ही दिन हुए मिले

की बात भी हुई नहीं। .... 
हम तो पूछते, रहे
पर आप ही मिले नहीं ....
जो मिल गए हैं आज तो
क़सर न रह जाए कहीं  …
शब्द तो बहुत हैं
पर आवाज़ ढूंढ  लीजिये। …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

कुछ हाल-ऐ-बयान ही करें

कुछ रंग पुराने भरें  ....
अगर है, फिर भी क़श्मक़श
तो खाली ज़ाम ही भरें ....
गुज़रे सालों से पूछिये ज़रा
छूटे हैं वो हसीं लम्हे कहाँ? …
थे जिस पे, आखिरी निशान 
वो क़िताब,  ढूंढ लीजिये ....
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

वो आरज़ू , वो हौसले

वो दूर होते,  फ़ासले  ....
वो शाम की रुबाइयाँ
वो मनचली पुरवाइयां  ....
अभी भी गूंजते हैं जो
वो गीत वो शहनाइयां।  …
आलम तो बन ही जाएगा
बस अंदाज़ ढूंढ लीजिये  ……
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

अभी भी वक़्त है हुज़ूर

हालात को करिए  क़ुबूल  ....
इन हसरतों की ग़ुलामी
से भी बड़ी है ज़िंदगानी  ....
यूँ आसमां की होड़ में
ज़मीन को ना छोड़िये  ....
ख़ुश रहे जो,  हर हाल में
वो मिज़ाज़ ढूंढ लीजिये  …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।

ये ज़िन्दगी की शाम है  …

अब आपको क्या काम है?
हमने तो चुन लिया है घर …
आपका क्या  इंतज़ाम  है ?
चले थे जिनको छोड़ कर
फिर मिल गए इस मोड़ पर  …
एहसास की कमी नहीं
ज़ज़्बात ढूंढ लीजिये  …
अपने लिए भी कोई
हमराज़ ढूंढ लीजिये।




वो पूछते हैं , अरे मुसाफिर चला कहाँ को?
क्या तेरी मंज़िल का पता तुझे है?....
कह दिया उनको,.... मैंने मुस्कुरा के.…
जहाँ पे मिलेगा …  ये सूरज ज़मीं से
है बस मुझे भी ,… जाना वहीँ पे …

हर दिन मैं मंज़िल , … नयी ढूंढता हूँ

अब मेरा मज़हब आवारगी है।

कभी मैं गुज़रता हूँ जंगलों से। …

कभी मैं निकलता हूँ पर्वतों से.…
नदी , झरने , राहें … हैं मेरे साथी
हर मुश्किल मुझे , नया  सबक सिखाती। …
सभी बंदिशों से ,  मैं बेखबर हूँ
आवारा परिंदों का ,  मैं हमसफ़र हूँ। .......

नहीं मेरा नाता मस्जिद , मंदिरो से.…
बस मेरा मज़हब आवारगी है !

सफर मैं मज़ा.. जब से आने लगा है

मेरा डर कहीं तो , ठिकाने लगा है.……
समेटा है जब से.. अपने हौसलों को
हर दर्द मुझसे खौफ खाने लगा है। ....
मजबूरियों  से जब...बढ़ा ली है दूरी। ....
अब जो भी कमी है...मैं कर लूँगा पूरी।

मेरी   आज़ादी  ही...  मेरी बंदगी है
हाँ मेरा मज़हब आवारगी है.…




बहुत मुश्किल है.....

Posted by Priyanka Telang On 1:38 PM 0 comments



बहुत मुश्किल है मोहब्बत में.……
कभी जीना कभी मरना। ....
बड़ी शिददत से देखना तुझे ....
फ़िर एक आह भर लेना।

तेरा वो जान बूझ कर …
मुझे नज़रअंदाज़  कर  देना।
और मेरे दिल मैं सवालों के  …
कई सैलाब उमड़ना।

तेरा.. मेरे बारे मैं सोच कर ....
वक़्त ... ज़ाया नहीं करना
और मेरा... कोई भी लम्हा  …
तेरे बगैर.. ज़ाया नहीं होना।

वो तरस खा कर... कभी मेरी हालत पर …
तेरा अफ़सोस... कर लेना ।
वो हर बदलाव पर... तेरे  …।
मेरा... चुपके से रो लेना।

बिना दुशवारियों के..  वो तेरा
मुझसे बढ़ा लेना फासले  ....
मेरा... भुलाने  की कश्मकश में भी …
तुझ ही को याद कर लेना।

शब्-ए -फ़रहत  बिताना तेरा …
 किन्हीं और बाँहों में
और मेरा रात भर एकटक ...
खाली... दीवार को तकना

बड़ा मुश्किल है मोहब्बत में ...
कभी जीना कभी मरना।
वो तेरा बच के निकल लेना ....
मेरा बर्बाद हो जाना।



शब्-ए -फ़रहत - nights of pleasure




फिर से वक़्त ने करवट ली है … 
फिर मेरे दिल का हाल वही है …… 
मेरे हौसलों पे... तो मुझको यकीं हैं 
पर क्या खो गया है?.…ये किस की कमी है ?
क्या साथी कोई छूट गया है ?
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


हुआ कोई यूँ बिन इजाज़त के दाखिल। ….  
जो मुमकिन नहीं था.….  वो कर गया हासिल 
हिजाक़त पे मेरी … परदे गिरा के …
खुली आँखों से मुझको …  सपने दिखा के 
कोई अरमानों को लूट गया है। 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


सफ़र कट रहा था तन्हाई मैं भी.… 
उस राही ने क्यूँ? …  मुझको आवाज़ दे दी। 
सूने पड़े दिल मैं मेरे  …. हलचल मचा के 
मेरे ज़हन मैं अपनी … यादें बसा के 
वो लगता है.… सब भूल गया है। 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


राह-ऐ-दहर पे.…  मैं बढ़ तो गया हूँ। 
कोई... मंजिल नहीं है, जहाँ को चला हूँ। 
मैंने दर्द-ऐ-ग़म से, भर के … वक़्त खाली
अपनी बेगानों में भी... जगह बना ली। 
पर अपना कोई रूठ गया है 
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


ना मैंने शिकायत की ... रब से कोई 
पर सांसों में अब भी... क्यूँ बसता है वो ही?
काबू में कर के.... अपनी हसरतों को ...
मैंने हंसी... से.... सजाया, लबों को...
पर आँखों से सब फूट गया है ...
अन्दर से कुछ टूट गया है। 


हिजाक़त  - wisdom






ज़िन्दगी तुझसे कई उम्मीदें लगा बैठे हैं।
क्या कहें ख्वाहिशें क्या दिल में सजा बैठे हैं।


 ग़म से तोड़ दिए हमने.............. पुराने रिश्ते

बेपरवाह होके........... नए रिश्ते बना बैठे हैं।


शोर न समझो... मेरी सांसों के बदलते सरगम को

ये साज़ हम.............. बरसों से दबा बैठे हैं।


क्या मिला है किसी को.… साहिल पे खड़े होकर

हम तो लहरों पे....... नयी राहें बना बैठे हैं।


ये वक़्त भी देखना बाकी था..... ऐ हमदम

की अफसाना-ऐ-हस्ती का मेरी.... लोग किस्सा बना बैठे हैं।


लुत्फ़-ऐ-हयात तो... गर्दिश मैं ही समझ आता है

गुज़र जायेंगे हर मुश्किल से... ये शर्त लगा बैठे हैं।


ज़रा बहती हुई हवा का रुख पहचानो।

इसमें कुछ लोग... हर चीज़ गँवा बैठे हैं।


ज़िन्दगी चुरा ले गयी......  वक़्त मेरे हाथों से

अब आखिरी दाव ज़िन्दगी का.... लगा बैठे हैं।







तेरी आँखों के चमकते मोती !
मुझे फिर एक बार डुबाने  चले हैं ...

क्या ये जानते नहीं मेरी हालत?
जो मुझे फिर से आज़माने चले हैं ..

बड़ी ही कशमकश में दिल है ...कैसे बहले ?
की वो हम पे दिल-ओ-जान लुटाने चले हैं। ...

ग़ज़ब ये इत्तेफाक़ है की तुझे याद भी आये हम ..तब
जब खुद को ... तेरी नज़रों से छुपाने चले हैं  ...

ये खुशबू जो तुम्हे अब बेक़रार करती है।
वो जूनून है .... जिसपे परवाने जले हैं ....

तू जिसकी जुस्तुजू  में .... बस कुछ ही पलों से है ..
हम उसे ... त़ाउम्र सम्हाले चले हैं ...

बड़ा हसीन शौक है ..मुहब्बत  मेरे हुज़ूर ...
कई सालों  से ... इस सफ़र पे ज़माने चले हैं ...

जो पहल कर ही दी है तुमने ... तो बस इतना समझ लो!
बड़े बर्बाद हुए हैं ...जो भी निभाने  चले हैं !

बहुत आजाब  है ...ग़म-ऐ-फुरक़त  से उबरना
कई मुददतों ...  से हम भी भुलाने चले हैं !

कल क्या होना है ...क्या नहीं होगा ?
वो क्या सोचेंगे ..जो खुद तक़दीर  बनाने चले हैं !








ज़िन्दगी  आखिर.... तेरी वजह क्या है ?
मेरी आरज़ू अगर तू है... तो  फिर तलब क्या है?
हर एक मोड़ पे... मकाम नया दीखता है !
हर मकाम पे लेकिन ... ये नया मोड़ क्या है ?

ना बीती है ना .. बची है जो

ये दास्तान अधूरी है जो ....
मेरी मंजूरी  तो नहीं है
पर ये मजबूरी क्या है ?

ज़िन्दगी हाथों से रेत की तरह ... क्यूँ फिसलती है?  

हर आहट पे ये तन्हाई ... क्यूँ और भी मचलती है ?
गर  सांसों से ही बंधा है ... जीने का सबब ...
तो इस दिल के ... धड़कने का ... भला मतलब क्या है?

मेरे तरसते ख्वाबों को भी समझाए कोई

क्या  मज़ा ...सजा हँस के काटने मैं है .. बताये कोई ?
मेरी आँखों को ..पहले से ही खबर थी .. मेरे सपनों की
खलल जो नींद मैं .. आया तो ...गलत क्या है?

जो उम्मीद पे ही कायम है ये जहां ...

तो मेरे कन्धों का बोझ भी ... तो उतारे कोई ..
तम्मानाये जब होती  हैं  टूटने के ही लिए
तो बेवजह झूठे दिलासे की ज़रुरत  क्या  है।

ज़िन्दगी आखिर तेरी वजह क्या है ?.

मेरी आरज़ू अगर तू है... तो  फिर तलब क्या है?


कुछ  बीती  हुई  यादें  हैं
कैसे  मैं  जला  दूँ ?
कुछ  टूटे  हुए  वादे  हैं
कैसे  मैं  निभा  दूँ ?

में  मिटा  भी  दूँ  अतीत  
पर क्या  कभी  तुम  ना पूछोगे ?..
जो  कुछ  मुझ  पे  बीती  है ..
तुम  क्या  ही  समझोगे ?

मैं  गिर गिर  के  सम्हला  हूँ ..
किस  तरह  राहें सजा  दूँ ?

जिस  लिए  खामोश  हुआ  था
वो  राज़  कैसे  बता  दूँ ?

मैं   जिस  मंजिल  को  बढ़  रहा  हूँ
क्या  तुम  साथ  चलोगे ?
अगर  राहें  भटक  गयीं
तो  क्या  फिर  से  मिलोगे ?

तुम  मेरी  ज़रूरत  हो ..
कैसे  ये  जता दूँ ?

में  डरता  नहीं  हूँ  पर
तुम्हे  क्या  क्या  मैं  बता  दूँ ?...

नहीं  कहता  तो  संग-ऐ दिल..
जो  कह  दूँ  तो  रुसवा  हूँ
अजब  कशमकश  में  उलझा  हूँ
ये  किस  मंजिल  पे  पहुंचा  हूँ

अभी  हालात नहीं  हैं ..
कि जज़्बात बयान  हों
कभी  फुर्सत  मैं  तुम  मिलो  तो ..
ये  समंदर भी  खला  दूँ

तू  मेरी  हस्ती  की  वजह  है
जो  तू  नहीं  तो  मैं  नहीं
तुम  मुझे  हासिल  नहीं  तो  क्या
मैं तो  तुमसे  जुदा  नहीं ...

कोई  अफ़सोस  तो  नहीं  है
पर  आसां  भी  नहीं  कि
अपनी  हकीकत  को  भुला  दूँ

जो  सज़ा  मेरे  लिए  लिखी है
वो  तुम्हे  कैसे  सुना दूँ ?


ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया
जो  खो  गया  था  कहीं  मुझसे .. नहीं  मिल  पाया
मैं  अकेला  हो  गया  हूँ ... फिर  से  उन्ही  राहों  पे
जहाँ  शुरआत  हुई  थी ... अंत  भी  वहीँ  आया

जो ख्वाब सजाये थे कभी...  बिखरे  पड़े  हैं
मेरे  ही  कन्धों  पे सभी  इलज़ाम  लदे हैं
मेरी  उड़ान  पूरी नहीं हुई.... अब तक...
कि  मेरे  पाँव फिर  धरातल  पे .. आ  लगे  हैं

ठोकरें  बहुत खायी  हैं .. वैसे  तो अक्सर ...
पर इस  दफा गिरा हूँ ऐसा . कि  उठ  नहीं  पाया ..
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वज़ूद  पे  यकीन  आया ....

कैसे मैं सम्हालूं  .. इन  फिसलते  लम्हों  को ?
कैसे  सुधारूं ... मैं  अपनी  गलतियों  को ..?

मेरी  ज़िन्दगी  कि ... कहानी  अजब  है !
मेरी  गुस्ताखियों  का .. बस  इतना  सबब  है ..
कि  दुश्मन  नहीं  था..  कभी  कोई  मेरा ...
मैंने  अपने  ही  हाथों  अपना ... आशियाना ..जलाया ....
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....


जिसकी  आरज़ू में करवटें बदलता था रातों ...
छलनी  हुआ  है  वो ... मेरे  ही  हाथों ...
सुनाऊं मैं  कैसे?  ये  किस्सा  नहीं  था
जो  घायल  हुआ..  वो  था  मेरा  मसीहा ...

अपनी  लाश  पे  में ..बहुत  रो  चुका  हूँ
बताऊँ  मैं किसको ..कि  क्या  खो  चुका  हूँ ...
जिसको  लहू  से  था  सींचा .. वो  घर  मैंने  ढहाया
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ....

दुआओं  का  होता  नहीं .. मुझ  पर  असर  कोई 
वरना  महज़  हाथ  उठा  के  ओरों  ने  क्या  नहीं  पाया
कुछ  तो  कहीं कम था... मेरी  ही  बंदगी  में
जिसे  भी  खुदा  माना ..वो  फिर  नज़र  नहीं  आया !!
ज़िन्दगी  फिर  तेरे  वजूद  पे  यकीन  आया ...



हैं  बेसब्र  मेरी  रातें ...ये  दिन  बहुत  बड़े  हैं ...
मैं  तो  वहीँ  खड़ा  हूँ ..पर  आप  चल  पड़े  हैं ....


एक   राह  पे  चले  थे ..मंजिलें  जुदा  थी  अपनी ...
ये  वक़्त  क्यूँ  है  ठहरा  जो  हम  बिछड़  गए  हैं ...


जो  हर  शाम  गूंजते  थे ... वो  कहकहे  थे  अपने
क्यूँ  खामोश  हो  गया  मैं  ये  आप  समझते  हैं ....


एक  वक़्त  ऐसा  भी  था ... कि  अपनी  भी  दास्तान  थी ....
अब  जो  ढूंढा  है  फिर  सहर  को ...तो  कुछ  बिखरे  लम्हे  मिले  हैं .......


लगता  है  कुछ  तो  अपनी .. अनबन  है  ख्वाइशों   से
समझा  था  जिन्हें  अपना .. वो  औरों  को  हो  चले  हैं ....


अभी  भी  सुलगती  हैं  ..वो  आरज़ू ... वो  तमन्नाएं ...
ये  कैसी  हसरतें  हैं ...ये  कैसे  सिलसिले  हैं ....

मैं स्वतंत्र हूँ !!

Posted by Priyanka Telang On 9:24 AM 1 comments



सदियों से सदा......... मेरा शोषण हुआ
मन साफ़ था फिर भी.... आँचल मेरा मैला हुआ
मैंने तुम्हारे सम्मान  की  खातिर... क्या.. ना किया ?
तुम्हे पूजा... और स्वयं... विष अपमान का पीया 
  
ये विषपान करके भी... मैं अनंत हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

वो पदमिनी हूँ जिसने... निर्भीक हो जौहर  किया
वो जानकी हूँ जिसने... सदा स्वयं को अर्पण किया
में शक्ति हूँ परंतु फिर भी..... मैंने सब सहा
हर मोड़ पे अगनि परीक्षा दी... पर कुछ भी ना कहा 

ऐसी अखंड लौ हूँ जो.. आँधियों में भी ज्वलंत  हूँ!
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैंने आप खोकर.... तुमको नया आकार दिया 
खुद बलिदान हो.... तुम्हारे सपनों को साकार किया 
तुम्हारी जीत के पीछे... हमेशा मैं खड़ी थी
हर विषम परिस्तिथी से .. अकेली ही लड़ी थी 

तुम नहीं समझे... तुम्हारी  विजय  का  मन्त्र हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !

मैं जननी भी... मैं पत्नी भी ...सहेली भी ... मैं भगिनी भी  
मैं पृथ्वी भी... मैं अगनि  भी...जो तुम चाहो.... मैं सब कुछ हूँ 
ना रोको!.. जो मैं बढती हूँ .. तुम्हारे साथ चलती हूँ !
अहम् त्यागो और पहचानो.... मैं तुम्हारा संबल हूँ !

क्रांति की लहर है जो...  नारीत्व का वो नवीन अर्थ हूँ !
मैं स्वतंत्र  हूँ !


जिस दिन  तुझे  मेरी ... ख़ामोशी  सुनाई देगी  
उस दिन ये दुनिया ... कुछ और  ही दिखाई देगी 


बेआरजू  होके  निकला  हूँ .. तेरे  दर  से 
हर  आहट ... मेरे  बिलखते  अरमानों  की  दुहाई  देगी 


मैं अपने  आंसुओं  को ... पीता  रहूँगा  हरदम 
पर मेरी मुस्कराहट में ..... उदासी दिखाई  देगी 


तुने  मुझे  देखा  भी  नहीं ...करीब  ही  था  मैं 
मेरे  टूटे  हुए .. दिल  की  आवाज़  तुझे  क्या  सुनाई  देगी 


बहुत  दूर  चला  जा  चुका  हूँगा  मैं..  जबतलक 
तेरी  रूह....  मेरा  नाम  पुकारेगी ... सदा  देगी !


खुली  हवा  सा  बहता  था...  कैसे  मैं  बंध  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?

यूँ  ही  निकलता ...कभी  रुकता  कभी  चलता 
हर  रोज़ मैं किसी ... नए  मौसम  से  मिलता
कोई डोर  नहीं  थी ... बाँध  लेती  जो  मुझे 
कोई  छोर नहीं  था ... ना  ढूंढूं  में  जिसे !

 ये कैसा अँधेरा  है .. जिसे  देख  थम  गया  हूँ ...
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?

सूरज  की नर्म  किरणें ... हौले  से  थपकती  थीं 
गुज़रती हुई  हवाएं ... मेरे  गले  लगतीं  थीं 
ओस  की  बूंदों  में ... मेरा अक्स दीखता था   
हर राहबर मुझे... अपना कोई लगता था !

ये  वक्त  की  है  करवट ... या  मैं  बदल  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?


हर  शाम  ढूंढता  था .... कोई  नया  बसेरा ...
कई हौसले देता था..... मुझको नया सवेरा 
हर  राह  लगती  है ... अब  अजनबी  सी  मुझको 
जिनसे  कभी  था  मेरा ...सम्बन्ध बहुत  गहरा ..


ठोकर  लगी  है  मुझको ?.. या  में  फिसल  गया  हूँ ?
मैं तो  मुसाफिर  था ... ये  कहाँ  ठहर  गया  हूँ ?


जिस दश्त  से  तू  गुज़रे....  उसे  फूलों  से  सजा  दूँ
ये  आग  जो  भड़की  है....  उसे  और  लगा  दूँ


तू  आज  मुझे  जी  भर के..... देख लेने  दे  ज़रा
इस  नज़र  में  वो  असर  है...  कि  पत्थर पिघला  दूँ


दुनिया  की फिकर ना  कर....  ये  दुनिया तो... भरम  है
जो थाम ले तू हाथ मेरा ...,में अपनी अलग एक.... दुनिया ही  बसा  दूँ


पेशानियों  पे  लिखा है............ गर  नसीब तो
जो तुझसे..  जुदा  करे...  वो  लकीर  मिटा  दूँ


कौन  कहता  है  कि...  तनहाई  का  ताल्लुक  है  ग़म  से
तेरी  यादों  से...  तनहाई  की  महफिलें  सजा दूँ


ज़ाया  हुआ  है..  बहुत  वक़्त...  तेरी  आरज़ू  में  ऐ-हबीब
हर एक  पल  जो  बाक़ी  है..  तेरे  सदके...  मैं  लुटा  दूँ



तेरे  नाम  से  वा-बस्ताह  मुझे  मानने  लगे  हैं ..
इस  शहर  के  लोग .. अब  मुझे  पहचानने  लगे  हैं ...

मेरे  चेहरे  की  रौनक  में. .. तेरा  नूर  दीखता  है ...
ये  क्या  हुआ  है  मुझको ...ये  कैसा  करिश्मा  है ..

निगाहों  में  बस  गया  है ...चुपके  से  अक्स  तेरा ...
मुझसे  जुदा  हुआ  है ... हौले  से  सुकून  मेरा ...

अब  लोग  पूछते  हैं ...सवाल  कई  मुझसे ...
हर  बात  जोड़ते  हैं .. मेरी  बेकली  की  तुझसे ....

कैसा  अजब  नशा  है...अब  होश  ही  कहाँ  है ...
दास्तान  मेरे  दिल  की ...जानता  मेरा  खुदा  है ...

दीवानगी  ये  तेरी ...बन  गयी  है  उलझन  मेरी ..
जी  चाहता  है  फ़ना  होना ..मोहब्बत  में  सनम  तेरी ...

इस  बेखुदी  में  सब  कुछ ... हम  हारने  लगे  हैं
इस  शहर  के  लोग .. अब  मुझे  पहचानने  लगे  हैं ...


वा-बस्ताह  - attached,bound together
बेकली - Restlessness


यूँ  तो  कट  जाएगी 
ज़िन्दगी  की .. ये  डगर
तू  जो  मिल  जाए ... अगर
होगा  हसीन ... ये  सफ़र


कुछ  भी  आता...नहीं 
तेरे...  सिवा ... मुझको  नज़र
हो  गया  है...  इस  कदर 
रूह पर.... तेरा असर


थाम  लो  जो .. हाथ  तुम
फिर  मुझे ... किसका  है  डर
तेरे  ही  दिल  में रहूँ
नहीं  चाहता  .. कोई  नगर


अब  नहीं  है .. कोई  भी  
ग़म  मुझे .. ऐ  हमसफ़र 
जितनी  भी  खुशियाँ  मिलें 
कर  दूँ  सब .. तुझ  पे  नज़र ...


जब  भी  मांगूं...  दुआ
हाथ  अपने ..... जोड़  कर
में  यही  सजदा  करूँ
चाहूं..... तुझे ही  उम्र  भर!



ग़म  का  अक्सर .. आना-जाना हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


बे 'बाक  होके  में  चला .. मंजिल  को  पाने
बेख़ौफ़  हो .... निकला  था  खुद  को  आजमाने ..
कुछ  हादसा  ऐसा  हुआ ...सब  ख़ाक  हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


क्या  ज़मीं .... क्या आसमां ...
क्या फलक ...क्या  हावियाह..........
हर  जगह ... मेरा .. ठिकाना  हो  गया
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


अब  नहीं  कुछ  भी ..... की  जिसका  ग़म  करूँ
मुस्तकिल  नहीं  है कुछ ... तो  फिर  में  क्यूँ  डरूं
मेरा  नहीं  था  वो ... जो  मुझसे  खो  गया ..
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ...


सच्चा  नहीं  कोई ... तो  किसकी  में  सुनूँ ?
में  वो  बशर  हूँ .. जो अपनी  मर्ज़ी  से  चलूँ 
नयी  राह  पे  निकला....तो  रुसवा  हो  गया 
मुश्किलों  से .. दोस्ताना  हो  गया ..




हावियाह  :  The Lowest Region Of Hell
फलक     :  Heaven
मुस्तकिल  :  Never ending, Permanent
बशर    :  man, person

मजदूर ............

Posted by Priyanka Telang On 6:45 AM 1 comments


एक  दिन  मैं  ऑफिस  जा  रहा  था
और  रोज़मर्रा  की  तरह  झुंझला  रहा  था
एक  निरीह  आदमी  मुझे  देखे  जा  रहा   था
और  कुछ  सोचते  हुए  मुस्कुरा  रहा  था


काफी  देर  बाद  उसने  अपनी  चुप्पी  तोड़ी 
बोला  आप  नाहक  ही  परेशां  हैं  जबकि
आपकी  तनख्वाह  है  ज्यादा  और  हमारी  थोड़ी


मैंने  कहा  तनख्वाह  से  परेशानी  का  क्या  रिश्ता ?
टेंशन  तो  मुझे  देर  से  पहुँचने  का  है 
 वरना  मैं  भी  यहाँ  खड़ा  खड़ा  हँसता
इससे  तो  कम  मैं  तुम्हारी  तनख्वाह  मैं  पिसता


वो बोला अगर  ऐसा  है
तो  चलो  नौकरी  बदल  लेते  हैं
आप  मजदूर  बन  जाओ
हम  कंप्यूटर  कर  लेते  हैं


मैंने.......  व्यंग्य से कहा
कंप्यूटर  सीखना  बड़ी  टेडी  खीर  है
वो  मुस्कुरा  के  बोला  मजदूरी  कर  लीजिये
दो  दिन  और फिर कहिये  कैसी तकदीर  है ?


बात  ज़रा  देर  से  ही  सही..  मुझे  समझ  मैं  आई
मैंने  उसकी  तरफ  संवेदना  से  देखा  और  हमदर्दी  जताई
उसने  कहा........  आप  मुझ  पे  तरस  ना  खाइए
पर  खुद  को  जाके...  किसी  डॉक्टर  को  दिखाइए


बोला  हम  मजदूरी  मैं.........  पसीना  बहते  हैं
और  उसी  के........  कतरे - कतरे  से  खाते  हैं
आपके तो .......... पसीने  से  भी  खुशबू  आती  है
फिर भी ना जाने आप लोगों  को कैसी चिंता सताती  है ?


मैंने  उस  से.............  सबक  लिया
और  फिर  अपने  ऑफिस  को  लपक  लिया
मुझे  फिर  से  लेट  देख  बॉस  गुर्राया 
पर  फिर  भी............  मैं  मुस्कुराया 


उसने  गुस्से  से  कहा  क्या  तुम  समय  पे  नहीं आ सकते
मैंने  कहा  आप  ये  बात  प्यार  से  नहीं  बता  सकते
वो बोला  तुम्हे  पता  है  तुम्हारा  बॉस  तुम्हारे सामने  खड़ा  है
मैंने  हंसकर  पूछा  क्या  आपका कभी  किसी  मजदूर  से  पाला  पड़ा  है ??


तेरे  साथ  ज़िन्दगी  बिताने  कि  तमन्ना  है..........
तुझे  दिल में बसाने  की  तमन्ना  है..........


फूलों  में  रंग  तो  भर  दिए .... बहार  ने
अब  उन्हें  और ... महकाने  की  तमन्ना  है .....


यूँ  तो  होश  खोये  हैं ... कई  बार  मय-कदा   में.......
अब  तेरी  आँखों  में .. खो  जाने  की  तमन्ना  है


बहुत  हसरतें  तो  नहीं ..... रखता हूँ मैं दिल  में........
बस  एक  शाम  तेरे  पहलू  में  बिताने  की  तमन्ना  है...........


रातें  गुजारी  हैं  कई ... बेदारी  में हमने...........
एक  बार  तेरी बाहों में...  होश  गंवाने  की  तमन्ना  है ........


ना  दुनिया  की  गरज  है ... ना  अमीरी  की  इक्तेज़ा.......
कुछ  और नहीं बस .... तुझे  पाने  की  तमन्ना  है..........


ज़िन्दगी  बीत  रही  है .....मौत  भी  आएगी  एक  दिन......
क़ज़ा  के  बाद  भी  तुझे ...चाहने  की तमन्ना  है ......


Glossary
 बेदारी -  Alertness, Awakening, Rousing, Wakefulness, 
इक्तेज़ा -  Requirement, Need, Demand
क़ज़ा -   Destiny, Death, Fate, Jurisdiction, Judgement



मेरी  मंजिल  के  सफ़र  तक  सिर्फ  मेरी  तनहाई  थी 
मेरी  हमसफ़र  कोई  और  नहीं .. मेरी  परछाई  थी .... 

चल  पडा  था  ढूढने .....  अपना  ठिकाना 
ना  साथी , ना  राहबर , न...  कोई  बेगाना 
धुंधली सी  एक  रूह...  मेरे  पीछे  पीछे  आई  थी 
जो  देखा  तो  जाना...  वो  मेरी...  परछाई  थी ....

मैंने  फ़िक्र  नहीं  की .. चाहे  ग़म  हो  या  ख़ुशी ..
मुझे  हर  आशना  मिला .... जैसे  कोई  अजनबी ..
पर खलवत  मैं  भी  जैसे  किसी  ने  आवाज़  लगायी  थी 
में  पलटा  तो  देखा ... वो  मेरी  परछाई  थी ....

फिर  वो  मुकाम  आया , सब  खोया  जो  था  पाया 
मैं   रोया  चिल्लाया , पर  कोई  भी  ना  आया ...
जब  घोर  अंधेरा  था ... और  वीरानी  सी  छाई  थी 
वहीँ  पे  खड़ी  थी .. वो  मेरी  परछाई  थी ...


कभी  गिरा  कभी  दौड़ा , कभी  ठहर  गया  थोड़ा
बड़ी  अज़ीयत  मैं  भी ... मैंने  हौसला  न  छोड़ा ...
अपने आप  ही  मैंने  नदामत  की  दिवार  गिराई  थी 
जो  साथ  थी  मेरे  हरदम .. वो मेरी  परछाई  थी 

अब दिन संवर गए हैं... मौसम बदल गए हैं
सारवत के हमारी अब .. आलम नए नए हैं 
मेरी बरक़त को देख... वो  होले से मुस्कुराई थी
कोई ओर नहीं............ वो मेरी परछाई थी 

आशना - acquaintance 
खलवत - Solitude, Isolation
अज़ीयत- Trouble, Difficulty
नदामत - Guilt, Regret, Repentance
सारवत - wealth, prosperity